यह ब्लॉग मेरा एक निजी प्रयास है.... अपने विचारो को साधारण भाषा में अपने मित्रों और अनजान लोगों से भी शेयर करने का। जो मेरी समझ है उससे मैं लिख रही हूँ। यदि कहीं कोई बात अनुचित है या गलतियां हैं या समाज के किसी वर्ग के प्रति शोषण/ या किसी पर शोषक का गलत लेबल लगता है या किसी की भावनाओं को ठेस लगती है या कोई बात गलत लिख गयी है - तो वह मेरे interpretation की भूल हो सकती है।ऐसा होने पर मैं (अग्रिम) क्षमाप्रार्थी हूँ,,,,,,,,,,,,, | यह कोई धार्मिक पुस्तक या शास्त्र आदि नहीं - सिर्फ एक निजी प्रयास है। इससे या इसमें हुई गलतियों से कृपया किसी धर्म / वर्ग / समाज / .... पर कोई आक्षेप न लगाएं। जैईईईईईईईईईईइ श्रीईईईईईईईईईइ कृष्णाआआआआआआआअ;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;;
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सभी आदरणीय सदस्यो को सादर वन्दन 🙏🙏🙏 अगर हम किसी को मतलबी कहें तो वो शायद हमसे झगड़ा करने लगेगा। मगर ये अटूट सत्य हैं कि हममें से 95 % लोग मतलबी हैं । हम अपनो के साथ मतलब के सम्बंध रखते रखते भगवान से भी मतलब के सम्बंध निभाते है । एक बात जरूर सोचना जब आप घर के लिये या मन्दिर के लिये भगवान की कोई मूर्ति लाते हो तो क्या मोलभाव नही करते ????? क्या भगवान का कोई मोलभाव होता हैं ?? दूसरी बात जब आप मन्दिर में भगवान को जो चावल अर्पित करते तो जो आप घर मे बासमती चावल खाते वही चढ़ाते या हल्के सस्ते चावल अर्पित करते हो । सोचिये ?????? क्या किसी गरीब को आपने कभी घर बुलाकर घी लगाकर पकवान खिलाये या बासी रोटी जो बची वो दी सोचिये ?????? क्या आप अपने इष्ट देव के मंदिर मे जाकर उनकी सेवा निस्वार्थ भाव से की ????? क्या आप जानवर को जो अन्न खिलाते वो सस्ता खरीदते हो ???? दरअसल जब हम बीमार पड़ते,या कुछ समस्या आती हैं तो भगवान की शरण मे जाते और कुछ मन्नत मांग लेते,ईश्वर के आश...
तीन पदार्थ हैं- एक ईश्वर, एक जीवात्मा,एक प्रकृति। इन तीनों के बारे में विचार करेंगे, बारी-बारी से चिंतन करेंगे। फिर कोई न कोई निर्णय हो जाएगा। पहला प्रश्न- क्या जीवात्मा सृष्टि बना सकता है ????????? उत्तर है- जीवात्मा सृष्टि को नहीं बना सकता। तारों को नहीं बना सकता, पृथ्वी को नहीं बना सकता। यह उसके वश की बात नहीं है। उसमें इतनी शक्ति, बु(ि व योग्यता ही नहीं है। तो तीन में से एक का निर्णय तो हो गया, कि जीवात्मा सृष्टि नहीं बना सकता। दूसरा प्रश्न- क्या प्रकृति स्वयं पृथ्वी बना सकती है???????? उत्तर है- कभी नहीं बना सकती। क्योंकि उसमें अक्ल ही नहीं है। सृष्टि की रचना को देखने से पता चलता है, कि कितनी बु(िमत्ता का इसमें प्रयोग किया गया है। बहुत बु(िमता से व्यवस्थित पृथ्वी बनी हुई है। किसी भी पेड़-पत्त्ते को देख लीजिए। वनस्पति शास्त्र पढ़िये। ऊँचे नीचे वृक्षों की रचना को देखिए, तो आपको पता चलेगा, कि कितनी व्यवस्थित है। शरीर विज्ञान पढ़िये। शरीर रचना को देखिए, कि वो कितनी व्यवस्थित है। नस, नाड़ियाँ, पाचन तंत्र, तंत्रिका तन्त्र आदि, सारे सिस्टम कितने व्यवस्थित हैं। इनमें जो इतनी व्यवस्था है- ...
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