हैरान होती हूँ मैं कि कई शताब्दियाँ गुजर गयीं लोगों को धार्मिक , ईश्वरीय किताबों को ढोते हुए, रटते हुए, लेकिन…..धर्म समझ में नहीं आया | मत, पंथ, सम्प्रदाय, परम्पराओं और कर्मकांडों को लोगों ने धर्म बना दिया | धर्म को अंग्रेजी में रिलिजन (religion) और ऊर्दू में मजहब कहते हैं, लेकिन यह उसी तरह सही नहीं है जिस तरह की दर्शन को फिलॉसफी (philosophy) कहा जाता है। दर्शन का अर्थ देखने से बढ़कर है। उसी तरह धर्म को समानार्थी रूप में रिलिजन या मजहब कहना हमारी मजबूरी है। मजहब का अर्थ संप्रदाय होता है। उसी तरह रिलिजन का समानार्थी रूप विश्वास, आस्था या मत हो सकता है, लेकिन धर्म नहीं। हालांकि मत का अर्थ होता है विशिष्ट विचार। कुछ लोग इसे संप्रदाय या पंथ मानने लगे हैं, जबकि मत का अर्थ होता है आपका किसी विषय पर विचार। यतो ऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है, जिसमें लौकिक उन्नति (अविद्या) तथा आध्यात्मिक परमगति (विद्या) दोनों की प्राप्ति होती है। धर्म का शाब्दिक अर्थ : धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र् + म = धर्...
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क्या हमारे ऋषि मुनि साई की उपासना करते थे ????????? क्या हमारे साधु-संत साई की पूजा करते थे ???????????? क्या हमारे भगवान ने या हमारे महापुरुषों ने कभी "साई" का नाम भी लिया ???????????? क्या हमारे किसी भी धर्मशास्त्र में साई का नाम है ????????? क्या साई के लक्षण, कर्म या आचरण भगवान या संतो जैसे रहे????????? ----------- इन प्रश्नो का एक ही उत्तर है -- नहीं , नहीं नहीं । लेकिन वो मूर्ख लड़के लडकिया जो बचपन में पाँच रुपये की डेरीमिल्क का लालच दिये जाने पर, पड़ोसी को 'पापा' कह दिया करते थे , ऐसे ही व ऐसी प्रवृत्ति के मूर्ख जन्तु ही , सांसारिक स्वार्थ के सिद्ध होने की लालसा में, साई व साई जैसे पाखंडियो को बाप भगवान सब बोल देते है। जो भी लोग कहते है कि इनकी भावनाओ का सम्मान करे , आहत न करे, वो एक प्रयोग करके देखे --- अपनी माता व भाई बंधुओ के सामने ... पड़ोसियो को पापा कहे " ... तब परिणाम देखे और फिर सोचे --- भावना अपने श्रेष्ठ अद्वितीय परमपिता को छोडकर, किसी निकृष्ट को बाप कहने वाले की आहत होती है , या अपने पिता का महत्व व पड़ोसी की निकृष्टता जानने वाली माँ ...