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Showing posts with the label विचारिये
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अधिकतर लोगों की  धार्मिकता किताबी धार्मिकता है | बिलकुल वैसे ही जैसे कोई रट्टामार, फर्रे चलाकर डिग्रीधारी हो जाता है | इंटरव्यू में भी रटे-रटाये उत्तर देता है और इंजीनयर भी बन जाता है | फिर पुल गिरता है, बिल्डिंग गिरती है उस इंजीनियर द्वारा बनाए हुए और कई लोग मरते हैं | कोर्ट केस का ड्रामा होता है और इंजीनियर बाइज्जत बरी होता है | बस यही सब धर्म के ठेकेदारों के साथ भी होता है | और यही सब होता है खोखले धार्मिकों के साथ | हर जगह लुटते हैं धर्म के नाम पर फिर भी अक्ल नहीं आती |  कुछ अच्छे  सिरफिरे सही राह दिखाने की कोशिश करते हैं, जब सही धर्म समझाने की कोशिश करते हैं तो घमंड आ जाता है सामने कि हमें तो किताबें पढ़ी हैं...चाहे समझ में धेले भर न आयी हो, लेकिन धार्मिकता की डिग्री तो मिली हुई है | इसलिए अकड़ है | लाजवंती के पौधे की तरह छुईमुई आपकी धार्मिक भावनाएँ आहत हो जातीं हैं | फिर मैं इस्लाम और मजहबो  की  दुश्मन हो जाती हूँ या फिर हिन्दू और हिंदुत्व का | लेकिन इनके अपने अपने टोलियो के ठेकेदार जो धंधा जमाये बैठे हैं धर्म का, उनसे इनको कोई शिकायत नहीं | क्यो...
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हैरान होती हूँ मैं कि कई शताब्दियाँ गुजर गयीं लोगों को  धार्मिक ,  ईश्वरीय   किताबों को ढोते हुए, रटते हुए, लेकिन…..धर्म समझ में नहीं आया |  मत, पंथ, सम्प्रदाय, परम्पराओं और कर्मकांडों को लोगों ने धर्म बना दिया | धर्म को अंग्रेजी में रिलिजन (religion) और ऊर्दू में मजहब कहते हैं, लेकिन यह उसी तरह सही नहीं ‍है जिस तरह की दर्शन को फिलॉसफी (philosophy) कहा जाता है। दर्शन का अर्थ देखने से बढ़कर है। उसी तरह धर्म को समानार्थी रूप में रिलिजन या मजहब कहना हमारी मजबूरी है। मजहब का अर्थ संप्रदाय होता है। उसी तरह रिलिजन का समानार्थी रूप विश्वास, आस्था या मत हो सकता है, लेकिन धर्म नहीं। हालांकि मत का अर्थ होता है विशिष्ट विचार। कुछ लोग इसे संप्रदाय या पंथ मानने लगे हैं, जबकि मत का अर्थ होता है आपका किसी विषय पर विचार। यतो ऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः। धर्म वह अनुशासित जीवन क्रम है, जिसमें लौकिक उन्नति (अविद्या) तथा आध्यात्मिक परमगति (विद्या) दोनों की प्राप्ति होती है। धर्म का शाब्दिक अर्थ : धर्म एक संस्कृत शब्द है। धर्म का अर्थ बहुत व्यापक है। ध + र् + म = धर्...
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क्या हमारे ऋषि मुनि साई की उपासना करते थे ????????? क्या हमारे साधु-संत साई की पूजा करते थे ???????????? क्या हमारे भगवान ने या हमारे महापुरुषों ने कभी "साई" का नाम भी लिया ???????????? क्या हमारे किसी भी धर्मशास्त्र में साई का नाम है ????????? क्या साई के लक्षण, कर्म या आचरण भगवान या संतो जैसे रहे????????? ----------- इन प्रश्नो का एक ही उत्तर है -- नहीं , नहीं नहीं । लेकिन वो मूर्ख लड़के लडकिया जो बचपन में पाँच रुपये की डेरीमिल्क का लालच दिये जाने पर, पड़ोसी को 'पापा' कह दिया करते थे , ऐसे ही व ऐसी प्रवृत्ति के मूर्ख जन्तु ही , सांसारिक स्वार्थ के सिद्ध होने की लालसा में, साई व साई जैसे पाखंडियो को बाप भगवान सब बोल देते है। जो भी लोग कहते है कि इनकी भावनाओ का सम्मान करे , आहत न करे, वो एक प्रयोग करके देखे --- अपनी माता व भाई बंधुओ के सामने ... पड़ोसियो को पापा कहे " ... तब परिणाम देखे और फिर सोचे --- भावना अपने श्रेष्ठ अद्वितीय परमपिता को छोडकर, किसी निकृष्ट को बाप कहने वाले की आहत होती है , या अपने पिता का महत्व व पड़ोसी की निकृष्टता जानने वाली माँ ...
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राज-नेताओं पर व्यंग्य या मजाक केवल मनोरंजन के उद्देश्य से करिए, उसे जीवन का उद्देश्य मत बना लीजिये |  क्योंकि व्यंग्य, कटाक्ष, आरोप आदि से वे लोग बहुत ऊँचे उठ चुके होते हैं | उनपर इन सब बातों का कोई असर नहीं करता | वस्तुतः वे लोग आध्यात्मिक चेतना के उस स्तर पर होते हैं, जहाँ सुख-दुःख, मान-अपमान, अपना-पराया सब व्यर्थ हो जाते हैं | जैसे एक ध्यानी केवल अपने ध्यान में मग्न रहता है, उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके पड़ोस में कोई मर रहा है या जी रहा है | उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि किसी पर कोई अत्याचार हो रहा है या नहीं हो रहा है | उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कोई भूख से मर रहा है या प्यास से मर रहा है... वह तो परमानन्द में खोया रहता है | वह तो ईश्वर के दर्शनों में खोया रहता है | ठीक इसी प्रकार नेतागण भी होते हैं | वे ईश्वर का ही भौतिक रूप ऐश्वर्य के दर्शन में खोये रहते हैं | उन्हें सिवाय ऐश्वर्य के और कुछ नहीं दिखाई देता, उन्हें जनता के दुःख, समस्याएँ आदि नजर नहीं आती....और जब ऐश्वर्य सामने हो, जय जयकार करते दुमछल्ले सामने हों...तो स्वाभाविक ही है कि व्यक्ति परमानन्द को प्राप्त हो जाता ...